Monday, June 23, 2014

एक कहानी छोटी सी...

पिछली रात काफ़ी मुश्किल भरी थी रामकिसन के लिए! पूरे दिन का थका हारा जब घर पहुँचा शाम को, तो देखा कि खाने में बाजरे की रोटी के साथ कुछ ना था! काकी ने सुबहा याद दिलाया तो था कि लौटते समय बनिए से थोड़ा गुड और ज्वार का आटा लेते आना, पर बनिया भी तो घाघ था! अभी 10 दिन पहले ही पूरे पैसे चुकाए थे, पर अब बोलता है कि 10 दिन में उधार काफ़ी बढ़ गया है, और ना देगा! 3 बच्चों का खर्चा, काकी की दवाई, फिर खुद के लिए ताड़ी भी लेनी होती है रोज़, नींद आने के लिए! ख़ैर, बनिए की गालियों के साथ बाजरे की रोटी तो निगल ली, पर निगोडा पेट उनको पचाने के लिए तैयार ना था! गालियों की आदत तो थी रामू के शरीर को, पर रोटी के साथ नहीं, थप्पड़ और पिटाई के साथ! जब शरीर में दर्द बर्दाश्त करने के लिए माँस नहीं बचता तो शायद दर्द होना भी बंद हो जाता है! जब से रामकिसन की बीवी गयी थी, शरीर पर तेल लगाने के लिए भी कोई ना बचा था! काकी खुद आँखों में सवाल लिए घूमती थी कि कोई उसके बुढ़ापे में थोड़ी सेवा कर दे! बच्चे अभी इतने बड़े ना थे कि रामकिसन की थकान का मरहम बनते, और खुद रामकिसन को भी उनसे कुछ कहते ना बनता था! खुद की गरज के लिए बचपन को मारना उसे अभी तक क़ुबूल ना हो पाया था!

खैर, किसी तरहा सुबा हुई, उम्मीद जगी कि आज तो कुछ अच्छा होगा ही! आज शायद थोड़े पैसे मिल जायें ठेकेदार से! सुबा होना ऐसा ही होता है, हर किसी के लिए! पौ फट्ते ही उम्मीद उठ जाती है अंगड़ाई लेते हुए! पंख ऐसे फैला लेती है कि पूरा आसमान समेटना हो जैसे!

2 बच्चे अपने फटे हुए कपड़ों में गली में निकल चुके थे, अपना दिन काटने! एक अभी थोड़ा छोटा था, उसे काकी घर में ही रखती थी! चूल्हा चोका करने के बाद अपने उपर लिटा लेती थी! बच्चे का तो पता नहीं, काकी को ज़रूर आराम मिलता था! थोड़ी अफ़ीम चाटने के बाद 4-5 घंटे आराम से निकल जाते थे काकी के बच्चे के साथ! वो तो दो निक्कंमे थोड़े बड़े हो गये थे, दिन में दो बार तो आके खाना माँग ही लेते थे! काकी को भेदना भी आसान ना था! चेहरे की झुर्रियाँ साफ पता देती थी की ऐसे जाने कितने बच्चों को काकी ने पानी में उतार के सूखा रखा था! ऐसे बच्चों कि उम्मीदों को चबा चबा के ही शायद काकी के दाँत जल्दी टूट चुके थे! बच्चे दिन के खाने के लिए आवाज़ लगा लगा के थक जाते थे, काकी टस से मस ना होती, आँख ही ना खोलती थी! शायद काकी तपा रही थी बच्चों को! उसे पता था कि अगर अभी से 3 समय खाने की आदत डाली तो आगे कम ही जी पाएँगे ये लोग! आज बच्चों का भूखे रोना उनके 15 साल बाद जीने और झेलने का सहारा बनेगा, ये काकी को अच्छे से पता था!

शाम होते होते उम्मीद जो सुबा उठी थी, अपने पूरे ज़ोर पर आ जाती है! घर जाना है, रास्ते से बानिए से गुड और ज्वार का आटा लेना है, फिर अपने लिए भी ताड़ी लेनी है! आधी ककड़ी भी कहीं से हाथ आ जाए तो शायद भगवान पर और पक्का हो जाए विश्वास. पर जब तक घर जाने के लिए कदम रास्ते को छूते हैं, तो उमीद भी सिमट के अपने घोंसले में छिप जाती है! आज फिर ठेकेदार से दो झापड़ और एक लात खा के ये तो समझ आ गया था रामू को कि आज फिर सुखी रोटी निगल के सोना पड़ेगा! भला हो जिसने ताड़ी बना दी, कम से कम एक पहर तो सुलाए रखेगी!

फिर से बाजरे की सुखी रोटी खा के रामू लेट गया, अगली सुबा के इंतज़ार में! नींद अभी रास्ता पार करके शायद आने वाली थी! इतनी देर में काम के नाम पे छप्पर को ताकने के अलावा और कुछ था नहीं! कुछ जगह से फूउस हट गया था, उपर थोड़ा थोडा आसमान दिख रहा था, जैसे रामकिसन के मन में झाँकने कि कोशिश कर रहा हो! कल अगर थोड़े पैसे मिल जायें, तो छप्पर की मरम्मत का इंतज़ाम करूँ, थोड़े दिनों में यही आसमान बादलों को ले आएगा अपने साथ घुमाने! निगोडे को जगह भी वही पसंद आती है बरसने के लिए जहाँ से छप्पर खराब हो चुके हों और पानी घर के अंदर तक चले! यही सब सोचते हुए आख़िर थोड़ी देर के लिए रामकिसन फिर से सपने लेने लगा! ठेकेदार, गुड, ज्वार का आटा, छप्पर, बच्चे, ताड़ी, काकी, बनिया, सब सैर कर रहे थे...

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